Thursday, June 23, 2011

प्रिय पाठकों

प्रिय पाठकों,
आप सब परेशान हो रहे होंगे की मैं कहाँ व्यस्त हूँ इनदिनों,काफी प्रियजनों ने अनुमान भी लगा लिया होगा... माता जी का स्वर्गवास हो गया है! पिछले महीने १९ मई को उनका जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष समाप्त हुआ, और जीत उनकी ही हुई!!! आप सब सोच रहे होंगे कि जीवन स्वरुप धूप पर मृत्यु का कफ़न पड़ने के बाद भी कोई कैसे जीत सकता है| जैसा कि मैंने अपनी पोस्ट डर के आगे जीत है!!!    मैंने उल्लेख किया था, उनका संघर्ष अपने सारे फ़र्ज़ पूरे करने का था| यूं तो हमसभी को कभी न कभी जाना ही है, परन्तु बहुत से लोग इस जीवन को व्यर्थ नहीं जाने देते, हमेशा कुछ न कुछ योगदान समाज में देते रहते हैं या फिर यथासंभव प्रयास करते रहते हैं|  माँ के साथ यह सब और भी मुश्किल था चूँकि वह "सिंगल मदर" थीं|

हे भगवान! पहली बार उन्हें "थीं" लिखा मैंने...
सच में, सच को सुनना और सच को मान लेने में बहुत फर्क है| एक महीने से ज़यादा हो गया है उन्हें गए, लेकिन आज तक उनकी मौजूदगी का एहसास हमेशा रहता है| सफ़र करते वक़्त, खाते पीते, लिखते, फोन पर बात करते वक़्त, सुबह दिन शुरू करने से पहले और अक्सर सोने से पहले उनकी हर एक हरक़त, हरेक भाव, हरेक स्पर्श ज़ेहन में घूमता रहता है| पता नहीं क्यों रोना नहीं आता बस उन्हें याद करना और करते रहना अच्छा लगता है, फिर जब महसूस होने लगता है की अब उनतक पहुँच नहीं सकती तो आँखे नम हो आती हैं| पता है, उन्होंने ही मुझे प्रकति और विज्ञान को जोड़ना सिखाया था| हर एक चीज़ में वह तर्क ढूँढती थीं| ज्ञान की बहुत चाह थी उनमें, हमेशा खाना खाते वक़्त अखबार का कोई टुकड़ा या पत्रिका, या फिर कुछ भी नामिले तो हम लोगों की ही कोई पाठ्य पुस्तक उठा कर पढ़ती रहती थीं| कोई भी कागज़ उनके हाथ के नीचे से बिना पढ़े नहीं जाता था| गीतों का कोई  शौक नहीं था उन्हें पर फिल्में अक्सर पसंद करती थीं, शायद वह फिल्में उन्हें पिताजी के साथ बिताये कुछ लम्हे याद दिला देती थीं|

बहुत सादी थीं मेरी माँ, बिलकुल तस्वीरों जैसी थी, सुन्दर नाक-नक्श, लम्बा कद, कमर से नीचे काले-घने लम्बे बाल,  सुघड़, मुस्कान तो उनकी सबसे-सबसे-सबसे अच्छी थी| आंखें थोड़ी  छोटी थीं पर उनकी चमक उनके ढ़ेर सारे संस्कारों और मज़बूत व्यक्तिव  का परिचायक थी| बड़ी लाल बिंदी उनके व्यक्तिव को और निखार देती थी| बहुत सुन्दर, बिलकुल भारतीय नारी सी गरिमा थी उनकी| साड़ी बहुत भाती थी उन्हें पर पिताजी के बाद काफी कम करदिया था साड़ी पहनना उन्होंने| आधुनिता और भारतीयता का अच्छा संगम था उनके वक्तित्व में, आफ़िस में हमेशा नया सीखने की ललक थी उन्हें और लंच टाइम में वह और उनकी सह्कर्मियाँ एक दुसरे को भजन लिखवाती थीं| ऐसा कोई व्रत नहीं था जो उन्होंने न किया हो, और पूजा अर्चना में सदैव नियम रखती थीं, यहाँ तक की अपने निधन से कुछ दिन पहले जबतक वह चल फिर रही थीं, वह पुरानी दिल्ली, अपने गुरु महाराज की राम नवमी की संगत में भी हमसे लड़कर गयी थीं|
हर काम भगवान को समर्पित करदेना और हर काम उनके लिए करना उनके संस्कारों में से एक था| भोजन को सदैव प्रसाद समझ कर बनाना चाहिए और पहले निवाले से पहले भगवान् को "रोटी" के लिए आभार व्यक्त करना चाहिए मैंने उन्ही से सीखा है| हर माँ की तरह वह भी अपने दुःख बहुत कम बांटती थी, और ज़रुरत से ज्यादा प्यार देती थीं| अभी तक तो उनके लिए लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी और अब जब कहना शुरू किया है तो शब्द कम पड़ रहे हैं| देखिये ना, जो बात कह रही थी उसे छोड़ कर कहाँ तक आ गयी हूँ| लेखन भी भूल गयी हूँ शायद अब...

माँ की जीत इसलिए कह रही थी चूँकि उन्होंने अपने संघर्ष, बलिदान, त्याग, आशीर्वाद और ढ़ेर सारे प्रेम से पिताजी जी को दिया अपना आखरी फ़र्ज़ भी पूरा किया|
जी हाँ, आप सब की शुभकामनाओं और सप्रेम आशीर्वाद से हमने भाई की शादी करवा दी थी| उनकी मृत्यु से तीन दिन पहले ही विवाह संपन्न हुआ| वह विवाह में भाग तो नहीं ले पायीं परन्तु वरवधू को आशीर्वाद उन्होंने ICU में ही दिया था| इसबात की हमारे पूरे परिवार को तसल्ली है की शरीर त्यागने से पहले वह पूरी तरह से निश्चिन्त थीं|

मैं आपसब सहभागियों का आभार व्यक्त करती हूँ, जिन्होंने ब्लॉग जगत का हिस्सा होने के नाते मुझे और मेरे परिवार को कैंसर से संघर्ष के दिनों में हौसला बढाया| मन से निकली हर दुआ में ताक़त होती है, आप सबका प्यार इस बात का सबूत है| माँ की अंतिम  इच्छा को पूर्ण करवाने के लिए आपने जो शुभकामनायें, सहयोग और आशीर्वाद दिए, मैं उसके लिए नमन करती हूँ|

हार्दिक धन्यवाद!
कविता
  

Monday, May 9, 2011

सचेतावस्था और जीवन

साथियों, आज मैं आप के साथ गौतम के जीवन में घटित, अपनी सबसे पसंदीदा घटना बांटना चाहती हूँ| मैं गौतम बुद्ध को प्रायः गौतम या सिद्धार्थ कह कर ही संबोधित करती हूँ|
 
 
 
सदधर्म मार्ग की प्राप्ति के दूसरे ही दिन, गौतम ने गाँव के सारे बच्चों को मिलने बुलाया! सभी बच्चे तैयार हो कर, समय से ही पीपल के नीचे एकत्रित हो गए| सभी कुछ-न-कुछ खाद्य पदार्थ उपहार स्वरुप लाये थे! सुजाता नारियल और ताड़-गुड की बट्टियां, नन्द बाला और सुभाष टोकरी भर मिट्ठा, एक प्रकार का संतरे जैसा फल लाये थे| गौतम ने सभी उपहार सहर्ष स्वीकार करलिये और सभी बच्चों के साथ मिलकर खाने लगे| सुजाता ने बीच मैं ही उठ कर घोषणा की  " आज हमारे गुरुदेव को सम्बोधि प्राप्त हो गयी  है, उन्होंने सदधर्म का मार्ग खोज लिया है|" सभी बच्चों ने आदर और प्रेम पुर्वक नमन कर, सदधर्म की शिक्षा के लिए अनुरोध किया|
 
गौतम ने बड़े प्यार से बच्चों को बैठाया और कहा की सदधर्म का मार्ग बहुत गूढ़ और सूक्ष्म है, लेकिन जो भी इस ओर अपना चित्त लगाएगा वह इसे समझ सकताहै और इसपर चल सकता है| उन्होंने कहा " बच्चों जब  तुम मिट्ठा छील कर खाते हो तो सचेत अवस्था के साथ भी खा खसकते  हो और बिना जागरूक रहे भी| सचेत हो कर मिट्ठा खाने का अर्थ है कि, जब तुम इसे खाओ तो भली भांति समझो और महसूस करो कि तुम क्या खा रहे हो| उसकी गंध और स्वाद को पूरी तरह आत्मसात कर लो| उसका छिलका उतारो तो तुम्हारा पूरा ध्यान छिलका उतरने में हो और जब एक-एक फांक खाओ तब उसके रंग, गंध और मिठास तो पूरी तरह अनुभव करो, उसके पीछे के जीवन का अनुमान लगाओ| मैंने इसकी हर फांक को पुर्ण जागरूकता  के साथ खाया है और पाया है कि यह कितनी मूल्यवान तथा अदभुत वस्तु है| यह मिट्ठा मेरे लिए एक निश्चित सत्य बनगया है, मैं इसे आजीवन नहीं भूल सकता| सचेत हो कर मिट्ठा खाने का यही अर्थ है|"
 
दोस्तों, सचेत अवस्था में जीवन यापन करने का अर्थ ही है की "अपने चित्त और शरीर को एक साथ मिला कर वर्त्तमान में जिया जाये"|  इसके विपरीत जीना, अचेत अवस्था में जीना है, जिसमें हम जानते नहीं की हमारे आस पास क्या और कैसे घट रहा है, कई बार हम अतीत और भविष्य में इतना खो जाते हैं की वर्त्तमान को नज़र अंदाज़ करदेते हैं| सचेतावस्था में जी कर ही हम अपने जीवन को मूल्यवान और अर्थपूर्ण बना सकते हैं|

Sunday, May 1, 2011

डर के आगे जीत है!!!

विज्ञापन के यह शब्द माँ ने मुझसे उस प्रश्न के जवाब मैं दिए थे, जब दूसरे ओपरेशन के बाद वह ठीक होकर अपने कमरे मैं आ गयी थीं| मेरी दोनों हथेलियों  ही गर्माहट और आँखों की नमी की ठंडक एक माँ का मन  शायद पढ़ चुका था| आँखों में ख़ुशी के आंसू, माँ की घटित तकलीफ की बूंदों में मिल चुके थे... समझ नहीं पा रही थी, कि उनके लीवर के ओपरेशन कि सफलता में रोऊँ  या उनकी पीड़ा को महसूस करके चीख़ पडूँ|

"माँ", यह नाम अपने आप में प्रेम, त्याग और शक्ति का संबल है| हर माँ अपने बच्चों और परिवार के पालन पोषण के लिए अपना अस्तित्व भी दाव पर लगा देती है, परन्तु विधाता कुछ चुनिंदा  लोगों को सहिष्णुता की पराकाष्ठा मापने के लिए निर्धारित करता है| पिताजी के गुजरने के समय वह मात्र ३६ साल की गृहणी थीं, जो समय किसी भी महिला के जीवन मैं सुख और संतोष लिए हुए आता है
माँ  के लिए वह समय बलिदान, आत्मसम्मान, और कठोर परिश्रम लिए हुए आया|
गाँव में पली बढ़ी लड़की अब महानगर मैं कार्यरत महिला थीं|

समाज को मर्यादा में बाँधकर अपने परिवार का आत्मसम्मान कैसे ऊँचा रखा जाता है, माँ उसका जीता जगता उदहारण थीं|  एक तनख्वाह में ३ बच्चों का पालन-पोषण और सामाजिक रिवाजों को वहन करना उन्होंने बखूबी सीख लिया था| अब जब हम सब बड़े हो गए और समाज में अपना स्थान बनालिया तो माँ को लगा की अब शायद दिन फिर जायेंगे... परन्तु नियति को शायद अभी उन्हें और तपा कर सोने से पारस  बनाना था| २००९ में उन्हें कैंसर हो गया| ४९ साल में ही मानो हम सब के लिए प्रलय आगई थी| बहुत अजीब हालत थी सब की,  हम चेहरों  पर मुस्कान और उम्मीद लिए हुए उनका सामना करते थे, परन्तु कहते हैं ना की एक माँ का ह्रदय बच्चों की धड़कने भी पढ़ लेता है, ऐसे ही वह भी हमारे दर्द को पहचान कर हमें संबल देतीं और हमेशा अपने आप में विशवास बनाये रखने को कहती थीं| वह पूरे  विशवास  से  हमें  कहती  थीं  की 
"जब  तक  डरते  रहोगे  जीत  नहीं पाओगे, डर को भूल कर देखो ज़यादा से ज़यादा क्या होगा..." वह वीरांगना विजयी हुई और २०१० मार्च में कीमो और RT की पीड़ा से उन्होंने अपने शरीर और हमारे मन को मुक्त करा लिया|
कई महीनों तक हम विजेता की भांति समाज में फैल रहे कैंसर के अंधविश्वासों को भेदते रहे, पता ही न चला की कैंसर का वह दैत्य कब फिर घर कर गया, मेरे और इनके बौद्ध धर्म अपनाने का कारण और कारक, धीरे-धीरे साफ़ होने लगा था| इस बार मम्मी कमज़ोर पड़ रही हैं और मेरा विशवास अपने चरम पर है| डॉक्टर ने इलाज एक तरह से बंद ही कर दिया है, कहते हैं की "अब कुछ करने की गुन्जायिश ही नहीं रही... चंद दिन बचे हैं, ज़यादा हाथ-पैर मत मारिये, परेशानी  आप ही को होगी"|
अब मुझे  डर नहीं लग रहा, सिर्फ कर्म करने की इच्छा है की किसी तरह भाई की शादी माँ के हाथ से करा सकूं... वोह माँ जो इस उम्मीद  में मौत की चौखट तक पहुँच गई की एक बार अपने सब बच्चों को दुनियादारी में सफल देख सकूं| खुद के लिए कभी कोई रंग नहीं चाहा सिर्फ सफ़ेद रंग में ही दुनिया बसा ली| अपने हालातों से कभी समझौता न करने वाली मेरी माँ आज जीवन-मृत्यु के गोरख धनंदे में से जीवन के कुछ पल जीतना चाहती हैं, हॉस्पिटल के दर्द में बच्चों के सपनों को पूरा करना चाहती हैं| अपने आखरी क्षणों में भी लड़ रही हैं वह, मानो कह रही हो कि मैं  अपनी झाँसी नहीं दूँगी|
आज प्रभु से यह ही कामना है की अपने समय-चक्र को थोडा सा धीरे करदे और अपने अनमोल बच्चों की आकांशाओं को पूरा करने का साहस दे| जीवन भर जिसे सुख के लिए तरसा दिया उसे मौत के वक्त मुस्कान और संतोष दे| ज़िन्दगी की रेत से जिस सोने को रगड़ कर पारस बना दिया उसे दूसरों  की ज़िन्दगी रौशन  करने का मौका तो दे|
हे ईश्वर मेरी माँ को स्वस्थ ज़िन्दगी दे!!!

Tuesday, April 19, 2011

यादें



कल शाम मेरी अज़ीज़ ने मुझे एक रचना मेल की, बाकि कुछ नहीं कहा उसने... सिर्फ लिखा था "कविता पढो ज़रा" :] मुझे बिलकुल उम्मीद नहीं थी कि उसके बाकि गुणों में से एक कविता लेखन भी है| जैसे-जैसे पढ़ती गयी, मेरी मुस्कान उसके आसुओं से सिकुड़ती जा रही थी, कुछ वक़्त  पहले उसने कुछ दर्द बँटा तो था, पर जैसे की उसकी फितरत है, वह सिर्फ और सिर्फ खनखनाती हुई अपनी हंसी बाँटती है बाकि बचे अपने ग़म, अपने ही आँचल में बाँधे रहती है|
दोस्तों आज की यह पोस्ट मेरी प्रिय मित्र "ऋचा" ने लिखी है, उसके द्वारा लिखी यह पहली पोस्ट है|

हिचकियों से एक बात का पता चलता है,
कि कोई हमें याद तो करता है, बात न करे तो क्या हुआ,
कोई आज भी हम पर कुछ लम्हे बरबाद तो करता है
ज़िंदगी हमेशा पाने के लिए नही होती, हर बात समझाने के लिए नही होती,
याद तो अक्सर आती है आप की,
लकिन हर याद जताने के लिए नही होती महफिल न सही तन्हाई तो मिलती है,
मिलन न सही जुदाई तो मिलती है,
कौन कहता है मोहब्बत में कुछ नही मिलता,
वफ़ा न सही बेवफाई तो मिलती है
कितनी जल्दी ये मुलाक़ात गुज़र जाती है
प्यास बुझती नही, बरसात गुज़र जाती है
अपनी यादों से कहो यहाँ ही  आया न करे
नींद आती ही नही , रात गुज़र जाती है  !
उम्र की राह मे ,रस्ते भी बदल जाते हैं,
वक्त की आंधी में, इन्सान बदल जाते हैं,
सोचते हैं कि तुम्हें याद इतना भी न करें,
याद ऐसी, कि सारी रात गुजर जाती है !
लेकिन आंखें बंद करते ही इरादे बदल जाते हैं कभी कभी दिल उदास होता है
हल्का हल्का सा आँखों को एहसास होता है छलकती है मेरी भी आँखों से नमी
जब तुम्हारे दूर होने का एहसास होता है|

Friday, April 8, 2011

राष्ट्रभक्ति


"हम वर्ल्ड कप जीत जाये", "हमारा भारत जीत गया", "भारत की विजय गाथा", "टीम इंडिया ने भारत को गौरान्वित किया"... यह सब और इनके जैसे सैकड़ो हेड लेंस ने, हमें गौरान्वित किया, हमें हर्षौल्लाहित किया, हममे से कई लोग रो भी पड़े थे, खूब नाचे-गाये और हर भारतीय ने अपने-अपने तरीके से अपना उत्साह और ख़ुशी ज़ाहिर की, आज भी कर रहे हैं| वह सब भाव सच्चे थे, हम सभी का अपने देश, अपने राष्ट्र, अपने भारत के प्रति प्रेम और गर्व था; पर ना  जाने  क्यों  मेरे मन  से दोपहर की घटना नहीं निकल पा रही थी, मैं इतनी बड़ी ख़ुशी में भी कई प्रश्नचिन्हों को अपने आस-पास मंडराते हुए देख रही थी|

सोच रही थी की सब लोग खुश हैं तो इस गंभीर विषय को कोई सुनेगाभी या बस यों ही लापरवाही में उड़ा देंगे? आप सब लोगों का मन नहीं ख़राब करना चाहती थी इसी लिए पोस्ट लिखने में इतने दिन लगा दिए...

बात शनिवार की है, सुबह से ही मैं, भाई और मामाजी हॉस्पिटल में, डॉ. से मिलने का इंतज़ार कर रहे थे| समय निर्धारित होने के बावजूद हमें दोपहर तक इंतजार करना पड़ा| खैर, वक्त गुज़र रहा था और हॉस्पिटल में भीड़ बढ़ रही थी| राजीव गाँधी में हर एक माले पर संयुक्त बैठक है, और बड़ी-बड़ी टीवी स्क्रीन पर लोग कभी समाचार तो कभी हालत का जायजा लेते नज़र आते हैं| उस दिन सभी लोग बेसब्री से मैच शुरू होने का इंतज़ार कर रहे थे, मैं लॉबी की बजाये डॉ के कमरे के बाहर ही बैठी थी... मैच शुरू हुआ, मारे ख़ुशी के मैं फटाफट बाहर आई; उस समय राष्ट्र-गान चल रहा था, मैं भी रुक कर गाने लगी... राष्ट्र-गान ख़त्म हुआ, जब निगाह स्क्रीन से हटी तो देख कर आहात हो गई कि एक भी सज्जन ना तो खड़ा ही हुआ था और ना ही किसी ने राष्ट्रगान गाया| सब के सब मुझे देख रहे थे, मानो मैंने कोई अपराध कर दिया हो... हद तो तब हो गई जब मेरा भाई भी बैठा रहा और जब मैं उसके पास जा कर बैठी तो मुझे डांटते  हुए बोला कि "तू ज़यादा देशभक्त है क्या? क्या ज़रूरत थी खड़े होने कि???"

इसके बाद मुझे काटो तो खून नहीं, समझ नहीं आ रहा था कि, किस किस से जा कर पूछूँ देशभक्ति  का अर्थ? क्यों कोई भी खड़ा नहीं हुआ था? उन सब को किसबात से शर्मिंदगी थी? अपने आप से या अपने देश से?

आप ही बताईये कि क्या हमारे राष्ट्र ने हमें इतना भी उत्साह और प्रेम नहीं दिया जिसके बदले में हम उसे सम्मान दे सकें? गर्व से राष्ट्र-गान गा सकें? जब कप जीत लिया तो दिल खोल के देशप्रेम ज़ाहिर किया, और रोज़? क्या हम अपने देश को हर रोज़ सम्मान नहीं दे सकते? क्या हमें स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस का ही इंतज़ार करना चाहिए? या फिर वर्ल्ड कप और कॉम्मनवेअल्थ जीतने का?

Thursday, March 31, 2011

रिश्ते



दोस्तों, हमारी ज़िन्दगी में हम कई रिश्तों को एक साथ जीते हैं... माँ और बेटी का रिश्ता, पिता और उनके ना होने पर भी उन्हें जीने का रिश्ता| दादी का दुलार, दादा की उँगलियों के बीच अपने आपको सबसे सुरक्षित महसूस करने का रिश्ता| चाचा और बुआ का मुझे गोद मैं उठाने के लिए अपने सब अज़ीज़ दोस्तों से झगड़ने का रिश्ता| चाची का कोमल स्नेह और फूफाजी जी के ढ़ेर सरे तोहफों के बीच अपने आप को अनमोल महसूस करने का रिश्ता| नानी के ढेर सरे पकवान और नाना जी के गणित में डूबे सवालों का रिश्ता| अपने तेराह भाईओं के बीच राजकुमारी सा महसूस करने का रिश्ता| अपने बहनों के बीच आदर्श व्यक्तित्व महसूस करने का रिश्ता| अपनी ज़िन्दगी के प्यार और उसे पाने का रिश्ता| शादी के अमिट बंधन में अपनी आत्मा को जोड़ने का रिश्ता... पर इन सभी रिश्तों को जीने के लिए हम सभी अपनी-अपनी इच्छायें और भावों को दफ़न कर देतें हैं, और फिर अपनी आत्मा से कहतें हैं...                       
                                         
ज़िन्दगी के तूफानों में, दफ़न हैं राज़ कई,            
कुछ तेरे- कुछ मेरे...                                                          
कामयाबी के रास्तों के हैं आगाज़ कई,
कुछ तेरे- कुछ मेरे...
रुसवाइओं  के पेड़ से झड़ने लगे हैं पत्ते कई,
कुछ तेरे- कुछ मेरे...
हवाओं में तैरते हैं, खुशबों के रंग कई,
कुछ तेरे- कुछ मेरे...
आसमान  चीर कर, यह ज़मीं  हुई है गीली... बिखरे हुए हैं अरमान कई,
कुछ तेरे- कुछ मेरे...


क्या वाकई में, हमारे लिए यह रिश्ते इतने लाज़मी हैं?
हाँ... यह सभी हमें इंसान बनाते हैं, ज़िन्दगी का एहसास करते हैं| कभी मीठी यादें बनाते हैं, कभी ज़हर के घूँट बन जाते हैं| रिश्ते ही हैं, जो ज़िन्दगी के पन्नों को पलटने के लिए हाथ बन जाते हैं, उस किताब में लिखा हुआ हर लफ्ज़ अपने ज़ेहन में उतरने के लिए आखें  भी दे जाते हैं| ज़िन्दगी को कभी महसूस किया है आपने... कैसे वोह हमारे जन्म के साथ ही पैदा होती है और कैसे मौत के सिरहाने बैठते ही, अपना आँचल समेटने लगती है|   इंसान गुनगुनाता हुआ, मुस्कुराता हुआ, आंखें पोंछ कर गा रहा है कुछ इस तरह...

होश न रहा, ढूँढता ही फिरा,
ऐ-ज़िन्दगी, तुझे पूजता ही रहा,
कतरा-कतरा बहती तू,
तुझे, तुझसे बटोरता ही रहा,
फूलों सी जन्मी थी तू,
मेरी आत्मा का बिम्ब लिए,
हर क्षण अपनी माँ की आँखों में,
तुझे देखता ही रहा...


रिश्ते, चाहे बने बनायें मिले हों, या हमारे अपने प्यार की सलोनी सौगात हों... हमेशा हमें जिंदा रहने का और इस खूबसूरत ज़िन्दगी को जी-भरके जीने का मार्ग दिखाते हैं| अपने रिश्तों हो सहेज कर रखिये दोस्तों, यह सभी अनमोल हैं...

Friday, March 25, 2011

गुलमोहर


मेरे आंगन में एक गुलमोहर लगा दो...
जिस से बातें करते-करते , वक़्त के हर लम्हे को मैं चुरा लूं,
शाम-सवेरे एक टक देखूं, जिसके दरश से मैं किस्सा बना लूं,
मेरे आंगन में एक गुलमोहर लगा दो...

गीले-गीले मौसम मैं फिर, जिसके रंग में, मैं तन यह रंगालूँ,
हंसती-गिरती पंखुड़ियों से मैं, अपना घर-बार सजा लूं,
मेरे आंगन में एक गुलमोहर लगा दो...

भोर की लालिमा में उगते, गुमोहर में, मैं रवि का भ्रम ना कहीं पा लूं,
चेहचाहती हुई चिड़िया जब बैठे उस पर, तो बसंत गीत मैं उस संग गा लूं,
मेरे आंगन में एक गुलमोहर लगा दो...

भरी दोपहरी वह पंख झेलता, उस के चरणों में बैठी मैं, ज़िन्दगी से राहत पा लूं ,
अपनी नारंगी कलियों का जो करे बिछोना, उस संग कैसे ना प्रीत लगा लूं,
मेरे आंगन में एक गुलमोहर लगा दो...

कुछ लाल, कुछ गुलाबी, कुछ नारंगी सपने, उसके फूलों जैसे बना लूं,
लगे सूखने जब पत्ते वह भूरे, उनको अपनी याद बना किताबून के बीच बसालूँ,
मेरे आंगन में एक गुलमोहर लगा दो...

बहार लाऊं मैं फिर से उसपर, उसके संग एक उम्र बिता लूं,
झूमे  गुलमोहर, तो थिरकूँ मैं भी, उसकी ताल में ताल मिला लूं,
मेरे आंगन में एक गुलमोहर लगा दो...